Tuesday, April 13, 2021
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अन्याय के विरुद्ध अहिंसा की लड़ाई और आदिवासी मूल्यों की पढ़ाई अब साथ-साथ


पिछले तीन दशक में सरदार सरोवर बांध से हुए नफा और नुकसान की मोटे तौर पर दो तस्वीरें हमारे दिलो-दिमाग पर उभरती हैं. पहली तस्वीर बिजली, पानी और विकास की गंगा के रूप में प्रस्तुत की जाती है. दूसरी तस्वीर हजारों लागों के विस्थापन का दर्द लिए हमारे सामने उजागर होती है. नर्मदा पर बन रहे बांधों के जन विरोध के कारण समय-समय पर विकास बनाम विनाश चर्चा के केंद्र में रहता है. लेकिन, यह बात कम ही लोग जानते हैं कि सरदार सरोवर बांध के खिलाफ चल रहे आंदोलन की दो रेखाएं सामानान्तर चलती रही हैं. एक अहिंसा पर आधारित लड़ाई को जारी रखती है तो दूसरी रचनात्मकता का रास्ता दिखाती है.

ऐसी ही एक रचनात्मक कोशिश है ‘जीवनशाला’, जिसने हजारों लोगों के जीवन में रोशनी फैलाने का काम किया है. बता दें उजाला बांटने का यह प्रयास कई वर्षों से जारी है. प्रश्न है कि यह जीवनशाला क्या है? बांध से प्रभावित आदिवासियों के मुताबिक ‘लड़ाई-पढ़ाई साथ-साथ’ होना जरूरी है. यही सोच कर आदिवासियों ने अपने अंचल में अपने बच्चों के लिए ‘जीवनशाला’ नाम से कई स्कूल तैयार किए, जिनमें एक पढ़े-लिखे भविष्य का निर्माण अनवरत जारी है.

जीवनशाला में जनजातीय जीवनशैली और मूल्यों का शिक्षण दिया जाता है. फोटो साभार: जीवनशाला

विंध्यांचल और सतपुड़ा पर्वतमालाओं की ओट में यहां कई छोटे और सुंदर गांव हैं. यह गांव अपने जिला मुख्यालय से बहुत दूर और घनघोर जंगलों के बीच मौजूद हैं. इन जगहों पर स्कूल भवन बनने और शिक्षक आने की राह तकना कभी नियति का खेल समझा जाता था. ऐसा नहीं है कि बांध विस्थापितों ने बच्चों की शिक्षा के लिये कभी सरकार से गुहार नही लगाई हो. अधिकारियों को कई बार आवेदन दिए, फाइलें बनीं, लेकिन ये फाइलें कभी सरकी ही नहीं. हर बार सरकारी अधिकारी आश्वासन देते रहे और स्थिति जस की तस बनी रही.

आखिरकार, आदिवासियों ने खुद बदलाव की यह पहल की. तीन दशक पहले पहले चिमलखेड़ी और नीमगांव में जीवनशालाएं शुरू हुईं. यहां के आदिवासी बताते हैं कि एक तो काम नया-नया था और दूसरा ज्यादा कुछ मालूम भी नहीं होने से चुनौतियां पहाड़ की तरह खड़ी थीं. फिर भी जीवनशाला का आधार स्वावलंबी रखा गया.

शुरुआत से ही सीमित साधन, संसाधन और समुदायिक क्षमता के अनुरूप बेहतर शिक्षा की बात पर बल दिया गया. इन जीवनशालाओं का मकसद महज सरकारी स्कूलों की शून्यता भरना भर नहीं था बल्कि आदिवासी जीवनशैली को कायम रखना भी था. आज की तारीख में इन इलाकों में तेरह से ज्यादा जीवनशालाएं संचालित हो रही हैं, जो आसपास के पंद्रह सौ से ज्यादा बच्चों को जिन्दगी की बारहखड़ी सिखा रही हैं. भले ही जीवनशाला का जन्म विस्थापन रोकने की लड़ाई का नतीजा रहा हो, मगर जल्द ही ऐसे स्थान आंदोलनकारियों के लिये विविध चर्चा, रणनीति और कार्यक्रम आयोजन का मुख्य केन्द्र बन गए. इस प्रकार, आंदोलन और जीवनशाला, दोनों एक-दूसरे के लिए मददगार साबित हुए. यही वजह है कि आज ऐसे स्थान आदिवासी एकता और भागीदारी के प्रतीक बन गए हैं.

जीवनशाला में पढ़ाई-लिखाई का तरीका सहज है. लोगों के बीच से कुछ लोग निकले और शिक्षक बन पढ़ा रहे हैं. इसमें गांव की बोली को वरीयता दी गई. इस दौरान किताबों का प्रकाशन भी पवरी या भिलाली जनजातीय बोलियों में किया गया. पहली बार बच्चों को उनकी बोली की किताबें मिल सकी हैं.

शिक्षकों ने “अमर केन्या” (हमारी कथाएं) में कुल बारह आदिवासी कहानियों को समेटा है. इसके अलावा सामाजिक विषयों पर “अम्रो जंगल” (हमारा जंगल) और “आदिवासी वियाब” (आदिवासी विवाह) जैसी किताबों को लिखा गया है. केवल सिंह गुरूजी ने “अम्रो जंगल” में यहां की कई जड़ी-बूटियों का महत्व बताया है. खुमान सिंह गुरूजी ने “रोज्या नाईक, चीमा नाईक” किताब में अंग्रेजी हुकूमत के वक्त संवरिया गांव के संग्राम पर रोशनी डाली है. ऐसी किताबों में आदिवासी समाज का इतिहास, साहित्य, कला, संस्कृति और परंपराओं से लेकर स्थानीय भूगोल, प्रशासन और कानूनी हक तक की बातें होती हैं. जब आप किसी जीवनशाला में जाते हैं तो आप देखते हैं कि एक तरफ यहां विस्थापन से विकराल आशंकाओं का इतना भारी बोझ है और दूसरी ओर जीवनशाला के नन्हें बच्चों के हाथों में खुली किताबों-सा खुला आसमान है.

हर किताब जैसे कुदरत के साथ दोस्ताना रिश्ता बनाने का संदेश देती है. पढ़ाई को दिलचस्प बनाने के लिये अनेक तरीको को अजमाया गया है. जैसे कि “अक्षर ओलखान” (अक्षरमाला) में यहां की बोली के मुताबिक अक्षरों की पहचान और जोड़ना सिखाया गया है. इसमें कई आवाजों को निकालकर या आसपास की चीजों से मेल-जोल कराना होता है. नाच-गाना, चित्र और खेलों से पढ़ाई मनोरंजक बन जाती है. इनमें लिखने की कई विधियों को भी बार-बार दोहराया जाता है.

जीवनशाला से निकली पहली पीढ़ी अब तैयार हो चुकी है. जो अब शिक्षक बनकर अपने संस्कारों को आगे बढ़ा रहे हैं. हालांकि, विस्थापन की प्रक्रिया ने उन्हें एक ऐसे बाज़ार में खड़ा कर दिया है, जहां जीवन की राह निकाल पाना मुश्किल है. लेकिन, जीवनशाला ने उन्हें इससे पार होने की सीख दी है.

विस्थापन यानी दोबारा या बार-बार बसना, सरकारी योजना का लाभ न उठा पाना, कानूनी हक से बेदखल, मेजबान समुदाय की आनाकानी, नया समायोजन, शोषण, यौन उत्पीड़न, अधिक व्यय, हिंसा, अपराध, अव्यवस्था, संसाधन या सीमित जमीन, निर्णय की गतिविधि से कटाव, अस्थायी मजदूरी, मवेशियों का त्याग, प्रदूषण, सुविधा व स्वास्थ्य संकट. ऐसे में फिर यही कहना है कि एक तरफ बांध के कारण विस्थापन से विकराल आशंकाओं का इतना भारी बोझ है. वहीं, दूसरी ओर जीवनशाला के नन्हें बच्चों के हाथों में खुली किताबों-सा खुला आसमान है, जहां उन्हें आगे बहुत-सी परीक्षाएं पास करनी हैं.

(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

ब्लॉगर के बारे में

शिरीष खरेलेखक व पत्रकार

2002 में जनसंचार में स्नातक की डिग्री लेने के बाद पिछले अठारह वर्षों से ग्रामीण पत्रकारिता में सक्रिय. भारतीय प्रेस परिषद सहित पत्रकारिता से सबंधित अनेक राष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित. देश के सात राज्यों से एक हजार से ज्यादा स्टोरीज और सफरनामे. खोजी पत्रकारिता पर ‘तहकीकात’ और प्राथमिक शिक्षा पर ‘उम्मीद की पाठशाला’ पुस्तकें प्रकाशित.

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