Friday, April 16, 2021
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कौन थे चार्ल्स डार्विन? कैसी थीं उनकी वो कॉपियां, जो गुम होकर बेशकीमती हो गईं


चोरी एक तरफ इंसानी फितरत है, तो दूसरी तरफ आज भी दुनिया के सबसे बड़े बाज़ारों में से एक है. ऐतिहासिक महत्व की कलाकृतियों की इंटरनेशनल बाज़ार (International Market) में इतनी कीमत है कि एंटीक चीज़ों की चोरी (Stolen Antiques) का इतिहास भी बहुत बड़ा है और वर्तमान भी. कभी आप नोबेल पुरस्कार (Nobel Prize) चुराये जाने की खबरें सुन चुके हैं तो कभी ऐतिहासिक तस्वीरें या ज्वैलरी वगैरह. अब ताज़ा खबर है कि 19वीं सदी के मशहूर जीव वैज्ञानिक (Biologist), इतिहासकार और लेखक चार्ल्स डार्विन की दो कीमती नोटबुक्स शायद चोरी (Darwin’s Notebooks Stolen) हो चुकी हैं.

यही नहीं, अगर यह चोरी हुई है तो यह भी संभव है कि इस चोरी को 20 साल हो चुके हों. खुलासा अब हुआ है, लेकिन घटना साल 2000 की हो सकती है. यहां से दो बुनियादी सवाल उठते हैं, पहला तो यही ​है कि डार्विन कौन थे और दूसरा यह कि उनकी कॉपियों के चोरी होने पर ‘हंगामा है क्यों बरपा’? इनके साथ ही, आपको इस सवाल का जवाब भी देते हैं कि चोरी का यह माजरा क्या है.

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चार्ल्स डार्विन, नाम तो आपने सुना होगा?

यकीनन. शायद स्कूल या कॉलेज की किसी किताब में पढ़ा हो. जीव विज्ञान में यादगार और बेशकीमती थ्योरीज़ देने वाले इंग्लैंड के विज्ञान अनुसंधानकर्ता डार्विन को ‘जीवन की उत्पत्ति’ के बारे में मूलभूत सिद्धांतों के लिए जाना जाता है. पृथ्वी पर जीवन की शुरूआत, विकास और रचनाएं कैसे हुईं, इस बारे में डार्विन ने वैज्ञानिक दृष्टिकोण और तथ्यों के आधार पर विवेचना कर अपने समय में कई मान्यताओं को हिला दिया था.

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मशहूर वैज्ञानिक और दार्शनिक चार्ल्स डार्विन.

साल 1859 में ‘ओरिजिन ऑफ स्पीशीज़’ जैसी क्रांतिकारी किताब जब छपी थी, तो उसने दुनिया के बारे में दुनिया की सोच बदल दी थी. इस किताब पर उस वक्त बेहद हंगामा हुआ था क्योंकि इस किताब ने दावा किया था कि विज्ञान के तथ्यों के मुताबिक दुनिया किसी चमत्कार से नहीं बनी बल्कि जीवों का विकास एककोशीय जीवों से क्रमबद्ध ढंग से हुआ था. इस किताब ने धार्मिक मान्यताओं को बुरी तरह खारिज किया था.

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‘द ​डिसेंट ऑफ मैन’ डार्विन की एक और महत्वपूर्ण किताब रही. 1871 में प्रकाशित हुई इस किताब में डार्विन ने चर्चा की थी कि पृथ्वी पर मनुष्य की रचना और विकास किस तरह हुआ. यह भी ​वैज्ञानिक व्याख्या आधारित किताब थी और ​इसने भी कई धार्मिक विचारों को सिरे से खारिज किया. इसी किताब से दुनिया में यह मान्यता चल पड़ी कि मनुष्य के पूर्वज प्राचीन समय के बंदर थे, विकास के क्रमबद्ध चरणों में जिनसे मनुष्य विकसित हुए.

डार्विन उन चंद वैज्ञानिकों, चिंतकों या दार्शनिकों में शुमार किए जाते हैं, जिन्होंने दुनिया की सोच और नज़रिया बदलने वाले विज्ञान आधारित विचार दिए. कला, अर्थशास्त्र, विज्ञान, धर्म और राजनीति में अब भी डार्विनवाद की छाप या असर देखे जाते हैं. अब जानते हैं डार्विन की उन कॉपियों के बारे में, जो अब चर्चा के केंद्र में हैं.

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डार्विन की जो नोटबुक ​मिसिंग है, उसमें इस ‘जीवन वृक्ष’ का स्केच है. (तस्वीर CAM.AC.UK से साभार)

डार्विन की दो ऐतिहासिक कॉपियां!
यह बड़ा प्रसिद्ध किस्सा है कि 12 फरवरी 1809 को जन्मे डार्विन जब 28 साल के थे, तब जुलाई 1837 में उन्होंने लंदन में चमड़े की जिल्द वाली अपनी ‘लाल कॉपी’ पर लिखा ‘मैं सोचता हूं’ यानी “I think” और फिर उसके भीतर लिखना शुरू किया था. जिस कॉपी में उन्होंने जीवन की उत्पत्ति और विकास से जुड़ी स्टडी के बारे में एक ट्री का रेखांकन किया था, वही कॉपी अब लाइब्रेरी से गायब बताई गई है.

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अपने 20 साल के अध्ययन को 24 नवंबर 1859 को पहली बार डार्विन ने प्रकाशित करवाया था और दुनिया को ओरिजिन ऑफ स्पीशीज़ का सिद्धांत मिला था. जो कॉपियां गायब हो गई हैं, उनमें इस थ्योरी से जुड़ी डार्विन की कुछ मन की बातें थीं, जो उन्होंने सिद्धांत और विचार की प्रक्रिया के तौर पर दर्ज की थीं. इन कॉपियों के मार्फत डार्विन के दिमाग में झांकने में मदद मिलती.

ज़ाहिर है कि डार्विन की हैंडराइटिंग में लिखी मूल कॉपियों के खो जाने से एक बड़ा नुकसान होता है. पोस्टकार्ड के आकार की ये छोटी डायरियां नॉलेज और एंटीक के लिहाज़ से धरोहर तो थीं ही, साथ ही कलाकृति या ऐतिहासिक महत्व की वस्तु के तौर पर भी बेशकीमती थीं.

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क्या है कॉपियां चोरी का मामला?
नवंबर 2000 में ये कॉपियां निर्माण कार्य के चलते कैंब्रिज यूनिवर्सिटी की लाइब्रेरी से टेंपरेरी तौर पर बाहर लाई गई थीं. लेकिन जब दो महीने बाद वापस अपनी अलमारी में रखी जानी थीं तब जनवरी 2001 में इनके गायब होने की बात सामने आई. इसके बाद लाइब्रेरी के चप्पे चप्पे पर इन्हें तलाशने का सिलसिला शुरू हुआ. 90 लाख आइटमों वाली इस लाइब्रेरी में दो छोटी सी कॉपियों को ढूंढ़ना कोई मामूली काम नहीं था.

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डार्विन की मिसिंग कॉपियां. (तस्वीर CAM.AC.UK से साभार)

काफी तलाश के बावजूद इन कॉपियों के न मिलने के बाद अब जाकर इनके गायब होने की बात सार्वजनिक करते हुए लोगों से अपील की गई है कि इन नोटबुक्स से जुड़ी कोई जानकारी उनके पास हो तो लाइब्रेरी की मदद करें.

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अब दो चार बातें खास हैं कि एक तो इन कॉपियों के चोरी होने के अंदेशे ज़ाहिर किए गए हैं, दूसरे इनकी तलाश का सिलसिला चालू है और लाइब्रेरी के कोने कोने में कॉपियां तलाशने में अभी और पांच साल का वक्त लगेगा. और यह भी कि इन कॉपियों को डिजिटाइज़ किया जा चुका था, लेकिन ओरिजनल का महत्व इससे कम नहीं होता और न ही इससे एंटीक के अंतर्राष्ट्रीय चोर बाज़ार में इन नोटबुक्स की कीमत कम हो जाती है.





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