Tuesday, November 30, 2021
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खान-पान के अंतर से बदला भारतीय व अमेरिकी आंतों में पाए जाने वाला बैक्‍टीरिया


ई दिल्‍ली. मध्‍यप्रदेश की राजधानी भोपाल के भारतीय विज्ञान शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थान (आईआईएसईआर) के शोधार्थियों ने आंत के बैक्टीरिया (Bacteria) पर एक अध्ययन किया है. इसमें पाया गया है कि भारतीय आंत के माइक्रोबायोम (यानि मानव ऊतक (टिशु) में रहने वाले माइक्रोबायोटा- (सूक्ष्मजीवों का वह समूह जो बहुकोशिकीय प्राणियों में पाए जाते हैं) का कुल जोड़) में बैक्टीरिया के प्रिवोटेला जीनस की बहुतायत है. इसमें भी विशेषकर प्रिवोटेला कोपरी नाम की प्रजाति सबसे ज्यादा पाई जाती है. वहीं पश्चिमी देशों जैसे अमेरिका रहने वाले लोगों के आंत के माइक्रोबायोम में बेक्टैरॉइड्स ज्यादा मात्रा में होते हैं.

इस अंतर के पीछे अहम वजह दोनों क्षेत्रों का खान-पान है. भारतीय खाने में पश्चिम की तुलना में ज्यादा कार्बोहाइड्रेट और फाइबर होता है. प्रिवोटेला इटली, मेडागास्कर, पेरू और तन्जानियां के लोगों की आंत में भी अधिक मात्रा में पाया जाता है, क्योंकि यहां के लोगों के खाने में भी फाइबर और कार्बोहाइड्रेट प्रचुर मात्रा में होता है. प्रिवोटेला बैक्टीरिया के कार्य को समझने के लिए शोधार्थियों ने उनका जीनोमिक विश्लेषण किया जिसमें पता चला कि बैक्टीरिया के जीनोम में एक विशेष स्थान होता है जो कार्बोहाइड्रेट और फाइबर के मेटाबोलिज्म (चयापचय) के लिए जिम्मेदार होते हैं. इस तरह से यह बैक्टीरिया एक स्वस्थ भारतीय जो कार्बोहाइड्रेट और फाइबर की भरपूर मात्रा का सेवन करते हैं उनकी आंत में माइक्रोबायोम को प्रबल बनाते हैं.

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भारतीय विज्ञान शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थान के दल ने भारत के विभिन्न स्थलों से जैसे म.प्र., दिल्ली-एनसीआर, राजस्थान, महाराष्ट्र, बिहार, केरल से आंत के बैक्टीरिया का 200 सैंपल लिए और उन पर अध्ययन किया. दल को एक और दिलचस्प बात जानने को मिली, अन्य प्रिवोटेला प्रजाति जैसे पी. इंटरमीडिया और पी. निग्रीसीन पश्चिम लोगों की आंत में पाया गया था. यह बैक्टीरिया आमतौर पर मुंह में पाया जाता है. जो मुंह-आंत की धुरी पर रहते हैं. इस बैक्टीरिया में उच्च विषाणु और एंटीबायोटिक प्रतिरोधक जीन पाए जाते हैं. इस बैक्टीरिया की वजह से पश्चिम में लोग आंत से जुड़ी बीमारियों को लेकर ज्यादा संवेदनशील होते हैं. यह अध्ययन नेचर पोर्टफोलियों जरनल बायोफिल्मस एंड माइक्रोबायोम्स में प्रकाशित हुआ था.

भारतीय विज्ञान शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थान के जीवविज्ञान विभाग के एसोसियेट प्रोफेसर डॉ. विनीत के शर्मा का कहना है कि हमारे इस अध्ययन से नए प्रोबायोटिक और प्रिबायोटिक को विकसित करने में मदद मिलेगी जो आंत से जुड़ी बीमारियों को ठीक करने में मददगार साबित होगा.
इंसानों की आंत में 300-500 प्रकार के बैक्टीरिया पाए जाते हैं जो हमारे लिए बेहद आवश्यक होते हैं. यह बैक्टीरिया पाचन, संक्रमण से रक्षा और यहां तक कि ज़रूरी विटामिन और न्यूरोकेमिकल को उत्पन्न करने में भी मदद करते हैं. 2011 में जर्मन वैज्ञानिक ने इंसानों को तीन एंटरोटाइप में वर्गीकृत किया है जो आंत में पाए जाने वाले बैक्टीरिया की संख्या पर निर्भर करता है. ये तीन प्रकार हैं- प्रिवोटेला, बैक्टेरॉइड और रुमिनोकोकस.

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