Tuesday, April 13, 2021
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जिन लोगों की शादी करने में नहीं दिलचस्पी, उनको Corona संक्रमण का खतरा ज्यादा


नई दिल्ली: कोरोना वायरस (Coronavirus) का संक्रमण दुनियाभर में लगातार बढ़ता जा रहा है. इस बीच एक स्टडी में खुलासा हुआ है कि जिन लोगों की शादी करने में दिलचस्पी नहीं रहती है, उनको कोविड-19 (Covid-19) संक्रमण का खतरा ज्यादा होता है. इतना ही नहीं कोरोना की चपेट में आने के बाद शादीशुदा लोगों की तुलना में अविवाहित लोगों में मौत का खतरा भी अधिक होता है.

क्यों होता है संक्रमण का ज्यादा खतरा

स्टडी में पता चला है कि अविवाहितों की खराब लाइफस्टाइल की वजह से अधिकांश लोगों की रोग प्रतिरोधक क्षमता शादीशुदा लोगों की तुलना में काफी कम होती है. यानी उनका इम्यून सिस्टम कमजोर होता है और इस कारण ये लोग कोरोना वायरस (Coronavirus) जैसी संक्रामक बीमारियों के संपर्क में बहुत जल्दी आ जाते हैं.

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क्यों कम होती है शादी में कम रुचि

‘द नेचर’ जर्नल में प्रकाशित स्टडी में बताया गया है कि बार-बार बीमार होने की वजह से अविवाहित लोगों की मानसिक स्थिति प्रभावित होती है. इस कारण इनमें लाइफ पार्टनर को लेकर आकर्षण कम होता है. ऐसे युवाओं में शादी और रिलेशनशिप में रुचि कम होती है.

स्वीडन की यूनिवर्सिटी में हुई स्टडी

स्वीडन की यूनिवर्सिटी ऑफ स्टॉकहोम ने कोरोना से संक्रमित लोगों और इससे हुई मौतों की आर्थिक, सामाजिक, मानसिक और शारीरिक स्थितियों सहित जीवन के कई पक्षों को ध्यान में रखते हुए अध्ययन किया. जिसमें कई खुलासे हुए हैं.

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इन लोगों को मौत का खतरा अधिक

शोधकर्ताओं ने रिसर्च में पाया है कि शादीशुदा लोगों की तुलना में अविवाहित लोगों में कोरोना वायरस (Coronavirus) की वजह से मौत का खतरा भी ज्यादा है. इसके अलावा इस बात का भी खुलासा हुआ है कि कम पढ़े-लिखे और कम आमदनी वाले लोगों में भी कोरोना संक्रमण के बाद मौत का खतरा अधिक होता है.

क्या भारत में भी लागू होंगे स्टडी के रिजल्ट

स्टडी को स्वीडन की स्थितियों को ध्यान में रखते हुए किया गया है और इसके फैक्टर्स को पूरी तरह भारत पर लागू नहीं किया जा सकता है, क्योंकि हमारे देश में शिक्षा और आय का स्तर कम होने के बावजूद पारिवारिक सहयोग बहुत अधिक रहता है.

भारतीय स्थित को लेकर एक्सपर्ट्स की राय

भारतीय स्थिति में इस स्टडी के फैक्टर्स पर एक्सपर्ट्स की राय है कि भारत में पारिवारिक लगाव काफी अच्छा होता है और बीमार होने के बाद अच्छी देखभाल होती है. इस कारण इसे भारत में लागू नहीं किया जा सकता है. हालांकि कम पढ़े-लिखे होने और कम आय के कारण इलाज में हुई देरी का असर भारतीयों पर हो सकता है.





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