Thursday, December 2, 2021
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‘नींद में ही हो गई दोस्तों की मौत…’ उत्तराखंड में बारिश के कहर में बचे मजदूर की आपबीती


देहरादून. उत्तराखंड (Uttarakhand) में कुछ दिनों से जारी बारिश (Rainfall) के कहर के बाद मंगलवार को थोड़ी शांति है. खबर है कि भारी बारिश और इससे जुड़ी घटनाओं में करीब 42 लोगों की मौत हो गई है. इनमें से 28 मौतें तो नैनीताल जिले (Nainital Districts) में ही बताई जा रही है. हालांकि, राज्य सरकार ने मुआवजे का ऐलान किया है, लेकिन दिवाली से कुछ समय पहले ही आई इस आपदा ने कई लोगों के त्यौहार सूने कर दिए. इस आपदा में अपनों को खोने वालों में 20 साल के काशीराम का नाम भी शामिल है, जो बताते हैं कि उनके कुछ दोस्त नींद से कभी जाग नहीं सके.

हिंदुस्तान टाइम्स के अनुसार, बिहार के काशीराम और उनके पांच सहकर्मी मजदूरी करते थे और नैनीताल के पास मुक्तेश्वर में अपनी कर्मस्थली के पास ही एक झोपड़ी में सो रहे थे. मंगलवार को झोपड़ी के पास मौजूद बिल्डिंग की दीवार गिर गई और वे मलबे में दब गए. इस घटना में उनकी जान जाते-जाते बची. मलबे में दबे काशीराम को SDRF ने मलबे से निकाला, लेकिन उनके सभी पांच साथियों की किस्मत अच्छी नहीं रही. 20 वर्षीय युवक को घटना के बारे में बहुत याद तो नहीं है, लेकिन वे बताते हैं, ‘हम सभी नींद में थे और यह अचानक हुआ. हम खुद को बचाने के लिए कुछ नहीं कर पाए. मैं खुशनसीब था, मेरे दोस्त नहीं और नींद में ही उनकी मौत हो गई.’

कुछ ही दिनों में निकलने वाले थे घर
काशीराम बताते हैं कि महीने के अंत तक सभी की योजना दिवाली के लिए बिहार रवाना होने की थी. अब उन्हें इस घटना की जानकारी लेकर जाना होगा. उन्होंने कहा, ‘हम हमारे परिवार के लिए कुछ खरीदारी करने वाले थे. मैंने कभी नहीं सोचा था कि ऐसा कुछ होगा.’

रिपोर्ट के अनुसार, इस घटना को लेकर नैनीताल एसपी प्रीति प्रियदर्शिनी ने बताया, ‘स्थानीय पुलिस और एसडीआरफ राहत कार्य के लिए तत्काल मौके पर पहुंची. यहां से पांच शवों को निकाला गया. जबकि, एक को बचाया गया और इलाज के लिए नजदीकी अस्पताल में भेजा गया. बीते 24 घंटों में जिले में अलग-अलग स्थानों पर 17 लोगों की मौत हुई है और 915 को बचाया गया है.’

एक और कहानी
58 वर्षीय नरोत्तम बहुगुणा नैनीताल शहर में रहते हैं. वे दया शंकर बिष्ट कॉलेज में कार्यरत हैं. वे सरकारी अस्पताल में डॉक्टर से मिलने के लिए सुबह 7.30 बजे निकले. वे क्षेत्र में असामान्य बारिश महसूस कर रहे थे, लेकिन फिर भी अपने घर से निकले. शहर की जीवनरेखा कही जाने वाली नैनी झील का पानी सड़कों और दुकानों तक पहुंच गया था. बहुगुणा बताते हैं, ‘मैं उस तस्वीर को कभी नहीं भूल सकता. वह पहली बार था, जब मैंने नैनीताल की सड़कों पर इतना पानी देखा था. नैनी का पानी सड़कों पर बह रहा था.’

बहुगुणा ने कहा कि बीच सड़के से पानी के बहाव से गुजरते उन्होंने किनारे तक पहुंचने के लिए वे जो कर सकते थे किया. वहां, पर वे रैलिंग के सहारे खड़े रहे. वे बताते हैं, ‘यहां मैं दो घंटों तक खड़ा रहा, जब तक सेना की टीम ने मुझे देखा और बचा नहीं लिया. उन्होंने मुझे अस्पताल में छोड़, क्योंकि वह नजदीक था. 6 घंटों के बाद जब पानी कम हुआ, तो मैं घर आ सका.’

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