Friday, July 30, 2021
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पीएम मोदी की जम्मू-कश्मीर के नेताओं के साथ बैठक कल, बड़े फैसले की अटकलें हैं बेबुनियाद


नई दिल्ली. जम्मू-कश्मीर की सभी प्रमुख पार्टियों के नेताओं से पीएम नरेंद्र मोदी अगस्त 2019 में हुई आर्टिकल 370 की समाप्ति के बाद पहली बार मिलने जा रहे हैं. लेकिन इससे पहले ही कुछ लोग जान बूझकर ये माहौल बनाने में लग गए हैं कि इस बैठक के दौरान पीएम मोदी जम्मू-कश्मीर को एक बार फिर से पूर्ण राज्य का दर्जा दिए जाने की घोषणा कर देंगे या फिर आर्टिकल 370 को फिर से जिंदा करने की मांग कश्मीर से जुड़े दल उनके सामने करेंगे. सवाल ये उठता है कि आखिर जिस केंद्र शासित प्रदेश में पिछले दो वर्षों में विकास की बहार तेजी से आई है, वहां हालात को फिर से बिगाड़ने के लिए इस तरह की मांगों और अटकलों को जान बूझकर क्यों उभारा जा रहा है? कहीं ये जम्मू-कश्मीर को फिर से अस्थिर करने की साजिश तो नहीं.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बुलावे पर जम्मू-कश्मीर के सभी प्रमुख दलों के नेता गुरूवार को प्रधानमंत्री आवास पर मौजूद रहने वाले हैं. इसमें नेशनल कॉफ्रेंस के नेता और पूर्व सीएम फारूक अब्दुल्ला भी होंगे, जो जम्मू-कश्मीर को स्पेशल स्टेटस देने वाले आर्टिकल 370 को फिर से बहाल करने के लिए भारत के दुश्मन चीन की भी मदद लेने की हुंकार भर रहे थे, तो वो महबूबा मुफ्ती भी होंगी, जिन्होंने ये कहा था कि आर्टिकल 370 को समाप्त किए जाने पर कश्मीर भारत के साथ नहीं रह पाएगा और वहां आग लग जाएगी.

जम्मू-कश्मीर में शांति के बीच दिल्ली में होने जा रही है बातचीत

लेकिन पिछले दो साल में ऐसा हुआ कुछ भी नहीं. दशकों तक जम्मू-कश्मीर की राजनीतिक रहनुमाई करते रहने वाले इन नेताओं की धमकियां धरी की धरी रह गईं और जम्मू-कश्मीर के लोगों ने न सिर्फ आर्टिकल 370 की समाप्ति को स्वीकार कर लिया, बल्कि पूर्ण राज्य की जगह केंद्र शासित प्रदेश बनने पर भी अपने लिए कोई असुविधा महसूस नहीं की. उल्टा हुआ ये कि कोरोना महामारी के इस दौर में जम्मू-कश्मीर का प्रशासन लेफ्टनेंट गवर्नर मनोज सिन्हा की अगुवाई में लोगों के लिए हर किस्म की जरूरी सुविधा मुहैया कराता रहा और लोगों की जान बचाने में कामयाब रहा.

तीन साल पहले हुई थी महबूबा मुफ्ती की सरकार बर्खास्त

महबूबा मुफ्ती की पूरे तीन साल बाद पीएम मोदी से आमने-सामने मुलाकात होगी. इससे पहले जब वो मिली थीं, तो उस जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री के तौर पर, जिसे आर्टिकल 370 के तहत विशेष राज्य का दर्जा हासिल था. तीन साल पहले जून के महीने में ही महबूबा की सरकार को बर्खास्त कर दिया गया था और पहले छह महीनों के लिए वहां राज्यपाल शासन लगाया था और उसके बाद संवैधानिक प्रक्रिया के तहत राष्ट्रपति शासन, जो तब जाकर खत्म हुआ, जब जम्मू-कश्मीर पूर्ण राज्य की जगह केंद्र शासित प्रदेश में तब्दील हो गया. अपनी सरकार की बर्खास्तगी के समय बीजेपी के साथ मिलकर महबूबा मुफ्ती जम्मू-कश्मीर में सरकार चला रही थीं, उसी बीजेपी की अगुआई वाली केंद्र सरकार ने आर्टिकल 370 की समाप्ति का मजबूत फैसला किया, जिसकी वजह से भारतीय संविधान लागू होने के समय से ही जम्मू-कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा मिला हुआ था.

तीन साल पहले PM ने तैयार किया था जम्मू-कश्मीर का रोडमैप

पीएम मोदी को 2018 के जून तक अहसास हो चला था कि महबूबा मुफ्ती की रोजाना की धमकियों और ब्लैकमेलिंग के साथ जम्मू-कश्मीर का चेहरा नहीं बदला जा सकता, जहां हालात को ठीक करने का उन्होंने संकल्प लिया है. जम्मू-कश्मीर की रहनुमाई के नाम पर वहां के तमाम राजनीतिक दलों ने लंबे समय से सिर्फ अपना उल्लू सीधा किया था, नेताओं ने अपनी जेब भरी थी, भ्रष्टाचार को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया था और राज्य में अस्थिरता का माहौल खड़ा कर रखा था, जहां से राज्य विकास की तरफ आगे नहीं बढ़ सकता था. ऐसे में महबूबा मुफ्ती की सरकार को बर्खास्त कर वहां की कमान राज्यपाल के मार्फत खुद लेने का विकल्प चुना था पीएम मोदी ने.

आर्टिकल 370 की समाप्त के करीब 22 महीने बाद बातचीत

उसके बाद अगले तीन साल के घटनाक्रम जम्मू-कश्मीर की राजनीति के हिसाब से काफी तेज रहे हैं. पहले राज्यपाल और फिर राष्ट्रपति शासन लगने के साल भर बाद आर्टिकल 370 की समाप्ति संबंधी बिल को संसद में पास किया गया और आखिरकार 6 अगस्त 2019 की राष्ट्रपति की अधिसूचना के साथ ही एक तरफ जहां लद्दाख को जम्मू-कश्मीर से प्रशासनिक तौर पर अलग किया गया. वहीं, खुद जम्मू-कश्मीर को पूर्ण राज्य की जगह केंद्र शासित प्रदेश में तब्दील कर दिया गया.

विकास प्रक्रिया हुई है तेज

जम्मू-कश्मीर की स्थिति में हुए इस बड़े संवैधानिक बदलाव के साथ ही जम्मू-कश्मीर में विकास के रोडमैप पर भी मोदी सरकार ने काम करना शुरू किया. तत्कालीन गवर्नर सत्यपाल मल्लिक की जगह मोदी ने अपने विश्वस्त अधिकारी गिरीशचंद्र मुर्मू को केंद्र शासित प्रदेश के तौर पर जम्मू-कश्मीर का नया लेफ्टिनेंट गवर्नर बनाकर भेजा. मुर्मू ने भ्रष्टाचार के मामलों की जांच से लेकर केंद्र के नया कश्मीर के विजन का लागू करने का काम शुरु किया.

पूर्ण राज्य का दर्जा देने का आश्वासन संसद में दे चुकी है मोदी सरकार

लेकिन जब विकास के साथ ही राज्य में राजनीतिक प्रक्रिया को भी आगे बढ़ाने की योजना पर काम शुरु हुआ, तो पीएम मोदी ने मुर्मू को सीएजी के तौर पर दिल्ली बुलाया और अगस्त 2020 में मनोज सिन्हा को जम्मू-कश्मीर का नया एलजी बनाकर श्रीनगर भेजा, जिस मनोज सिन्हा के पास सक्रिय राजनीति का चार दशक से भी लंबा अनुभव और केंद्र सरकार में मंत्री रहने के कारण प्रशासनिक मामलों की भी अच्छी समझ थी. जब आर्टिकल 370 की समाप्ति की जा रही थी और जम्मू-कश्मीर को केंद्र शासित प्रदेश बनाये जाने के बिल पर संसद में चर्चा हो रही थी, उसी वक्त मोदी सरकार ने साफ कर दिया था कि जम्मू-कश्मीर के हालात जैसे ही संतोषजनक स्तर तक सुधर जाएंगे, उसे पूर्ण राज्य का दर्जा देने में देरी नहीं की जाएगी.

जम्मू-कश्मीर में डेमोक्रेटिक प्रोसेस बढ़ा है आगे

पीएम मोदी के इसी विजन को जमीन पर उतारने के लिए मनोज सिन्हा ने पंचायत चुनावों के बाद डिस्ट्रिक्ट डेवलपमेंट काउंसिल यानी डीडीसी के चुनाव कराये. इरादा ये था कि देश के बाकी हिस्सों की तरह जम्मू-कश्मीर में भी त्रिस्तरीय स्थानीय शासन व्यवस्था को मजबूत किया जाए. जम्मू-कश्मीर की विशेष स्थिति को बहाल करने के लिए जो गुपकार एलायंस खड़ा किया गया था, उसमें शामिल नेशनल कांफ्रेंस और पीडीपी जैसी पार्टियों को भी झख मारकर इस चुनाव प्रक्रिया में शामिल होना पड़ा, इस डर के मारे कि कही उनकी जगह एक नया राजनीतिक विकल्प न तैयार हो जाए, राज्य के लोगों को उनकी जरूरत ही महसूस ही न हो.

विकास योजनाएं तेजी से हुईं लागू

एक तरफ इन चुनावों के जरिये डेमोक्रेटिक प्रौसेस को मजबूत किया गया, तो दूसरी तरफ विकास गांव-गरीब तक पहुंचे, इसकी भी पूरी कोशिश की गई. सड़कों से लेकर स्वास्थ्य और शिक्षा तक, केंद्र की तमाम योजनाओं को पूरी शिद्दत के साथ जम्मू-कश्मीर में पिछले दो वर्षों के अंदर लागू किया गया है. नौकरशाही के रुख में बदलाव किया गया है, महत्वपूर्ण प्रशासनिक सुधार किये गये हैं. मनोज सिन्हा खुद सड़क मार्ग से एक-एक जिले का नियमित दौरा करते रहे हैं, जिस जम्मू-कश्मीर में पहले सीएम तो दूर, मुख्य सचिव और डीजीपी भी सुरक्षा कारणों को आगे रखकर हवा हवाई यात्राएं करते रहे हैं.

जहां ये आशंका जताई जा रही थी कि आर्टिकल 370 की समाप्ति के साथ ही जम्मू-कश्मीर में आतंकवादी हिंसा काफी बढ़ जाएगी, वहां तमाम किस्म के भड़काउ बयानों के बावजूद आंतकवाद पर काबू पाने में प्रशासन और सुरक्षा बलों को कामयाबी मिली है, आतंकियों का सफाया किया गया है और आतंकवादी वारदातों पर काफी हद तक रोक लगाई गई है.

जान-बूझकर बैठक को लेकर कौन पैदा कर रहा है भ्रम की स्थिति?

सवाल ये उठता है कि आखिर जब ये सबकुछ हो रहा है, जम्मू-कश्मीर शांति और विकास के रास्ते पर आगे बढ़ रहा है, तो फिर पीएम के साथ होने वाली बैठक के पहले ये माहौल क्यों बनाया जाना शुरु हो गया है कि मोदी इस बैठक के दौरान जम्मू-कश्मीर को पूर्ण राज्य का दर्जा देने की घोषणा कर सकते हैं. या फिर ये कि जम्मू कश्मीर की तमाम पार्टियां आर्टिकल 370 की फिर से बहाली के अलावा और किसी शर्त पर डेमोक्रेटिक प्रौसेस में शामिल होने के लिए तैयार नहीं होंगी, जबकि वो पहले ही जिला स्तरीय चुनावों में भाग ले चुकी हैं.

अस्थिरता में ही कई लोगों को दिखता है अपना फायदा

ये आग भड़काने की कोशिश कौन कर रहा है. क्या इसके पीछे उन तत्वों का हाथ है, जो जम्मू-कश्मीर में अशांति या हंगामा होने पर अपने लिए संभावनाएं देखते हैं या फिर उनको अपनी बढ़ी हुई भूमिका दिखती है. जम्मू-कश्मीर में जनतांत्रिक प्रकिया लगातार, सिलसिलेवार आगे बढ़ रही है, ऐसे में बेचैनी की वजह क्या है, क्यों जानबूझकर अटकलों को हवा दी जा रही है, ये सवाल महत्वपूर्ण हो गया है.

माहौल बेहतरी के लिए है बैठक, बड़े फैसलों की घोषणा के लिए नहीं

स्वाभाविक तौर पर जम्मू-कश्मीर के संवैधानिक हालात में कोई भी बदलाव संसद में, सदन के अंदर होगा. जम्मू-कश्मीर सही समय आने पर फिर से पूर्ण राज्य का दर्जा हासिल करेगा, इसकी घोषणा खुद संसद में सरकार की तरफ से की जा चुकी है. ऐसे में पीएम के साथ होने वाली जम्मू-कश्मीर के राजनीतिक दलों की बैठक के पहले इस तरह के सवाल फिर से खड़ा करने का कोई मतलब नहीं. इसका मतलब सिर्फ एक ही हो सकता है वो ये कि कैसे जम्मू-कश्मीर को लेकर भ्रम की स्थिति पैदा की जाए या फिर बैठक के बाद ये कह दिया जाए कि नतीजा सिफर निकला, न तो पूर्ण राज्य के दर्जे से संबंधी कोई घोषणा हुई और न ही आर्टिकल 370 की फिर से बहाली को लेकर कोई आश्वासन. इस तरह का नैरेटिव खड़ा करने से सिर्फ उनको फायदा हो सकता है, जिन्हें जम्मू-कश्मीर में अशांति होने पर अपना फायदा दिखता है या फिर हमारे दुश्मन देश पाकिस्तान को, जो अभी तक कश्मीर मामले में मोदी सरकार की नीतियों से चारों खाने चित रहा है.

नहीं पालें बेवजह उम्मीद, पूर्ण राज्य में समय लगेगा

जहां तक मोदी सरकार का सवाल है, रुख बिल्कुल साफ है. जम्मू-कश्मीर में डेमोक्रेटिक प्रौसेस को आगे बढ़ाने की मंशा है, कोशिश ईमानदार है. प्रदेश में सक्रिय सभी पार्टियां इसके लिए स्वस्थ माहौल बनाएं, आगे बढ़ें तब जाकर पूर्ण राज्य के दर्जे की तरफ बढ़ने की प्रक्रिया तेज हो सकती है और फिर इसके बाद राज्य में विधानसभा चुनाव हो सकते हैं. लेकिन इससे पहले राज्य में डिलिमिटेशन की प्रक्रिया को पूरा होना है, जिसमें अभी समय लगने वाला है. सुप्रीम कोर्ट की पूर्व न्यायाधीश जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई की अगुआई में इस पर काम चल रहा है, समय अभी और लगेगा.

साथ मिलकर कर हो बेहतरी की कोशिश

ऐसे में जम्मू-कश्मीर का भला चाहने वाले सभी लोगों की मंशा ये होनी चाहिए कि माहौल स्वस्थ बने. पीएम मोदी भी यही चाहते हैं, इसलिए सामने से उन्होंने सभी राजनीतिक दलों के नेताओं को मिलने के लिए अपने पास बुलाया है. साथ बैठेंगे तो ढंग से बातचीत होगी, आगे का रास्ता खुलेगा. तुरंत कुछ नहीं होगा, न तो पूर्ण राज्य का दर्जा देने की घोषणा बैठक में होगी और न ही आर्टिकल 370 को फिर से बहाल करने का कोई आश्वासन उठेगा. इस बारे में पीएम मोदी ने पहले ही फुल स्टॉप लगा दिया है. ऐसे में कोशिश ये होनी चाहिए कि बैठक के पहले माहौल को बेहतर रखा जाए, जबरदस्ती उम्मीदों का पहाड़ न खड़ा किया जाए, अन्यथा तमाम किस्म की अटकलों को हवा देने पर राजनीतिक भरोसे का माहौल खराब होगा, न कि हालात बेहतर होंगे.



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