Friday, July 23, 2021
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प्रेशर पॉलिटिक्स के शिकार LJP के ‘5 पांडव’!: पांचों बागी सांसदों को अपनी पार्टी में शामिल कराना चाहती थी JDU, पर BJP ने दिल्ली में कर दिया ‘खेला’


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पटना3 मिनट पहलेलेखक: अमित जायसवाल

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LJP को तोड़ने के लिए JDU नेताओं ने जबरदस्त फिल्डिंग की लेकिन पारस समर्थक सांसदों की गेंद BJP के पास चली गई। - Dainik Bhaskar

LJP को तोड़ने के लिए JDU नेताओं ने जबरदस्त फिल्डिंग की लेकिन पारस समर्थक सांसदों की गेंद BJP के पास चली गई।

पशुपति कुमार पारस समेत लोक जनशक्ति पार्टी (LJP) से निलंबित किए गए सभी 5 सांसद दो राजनीतिक पार्टियों के बीच चल रही प्रेशर पॉलिटिक्स के शिकार हो गए हैं। हालांकि, दोनों ही राजनीतिक पार्टी एक-दूसरे के साथ गठबंधन में है। बिहार की सरकार को चला रहे हैं। एक-दूसरे पर प्रेशर पॉलिटिक्स का खेल खेलने वाले कोई और नहीं, बल्कि JDU और BJP है। LJP से चिराग पासवान के चाचा और हाजीपुर के सांसद पशुपति कुमार पारस और इन्हें समर्थन देने वाले बाकी के 4 सांसदों को तोड़ने के लिए JDU के नेताओं ने कड़ी मेहनत की। जातीय आधार से लेकर कई तरह के समीकरण बनाए। इनके बीच आपसी डील भी हुई।

पिछले साल हुए बिहार विधानसभा चुनाव के रिजल्ट आने के बाद से ही LJP को तोड़ने के लिए JDU नेताओं ने जबरदस्त फिल्डिंग की। कहा जाता है कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के इशारे पर JDU के कुछ बड़े नेता इस कदर मुस्तैद हो गए थे कि कोई कुछ भी करे, पशुपति कुमार पारस और उनके समर्थक सांसदों की गेंद बाउंड्री पार (BJP) के पास नहीं चली जाए। इसके लिए कई स्तर पर बिहार से लेकर दिल्ली तक कड़ी निगरानी रखी जा रही थी। नेताओं की टीम हर पल LJP के बागियों के मूवमेंट पर नजर रख रही थी।

चाचा पारस ने कहा-पांच पांडव हैं हमारे 5 सांसद

अपनी पार्टी में सांसदों का नंबर बढ़ाना चाहती थी JDU
2019 में हुए लोकसभा चुनाव में बिहार की 40 सीटों में 39 पर NDA का कब्जा है। इसमें 17 सांसद BJP के हैं। जबकि, सहयोगी JDU के पास 16 सांसद हैं। वहीं, LJP के 6 सांसदों ने उस वक्त चुनाव जीता था। 2020 में हुए बिहार विधानसभा चुनाव में जब चिराग पासवान की अगुवाई में LJP अकेले मैदान में उतरी तो नुकसान सबसे अधिक JDU का हुआ। BJP की तुलना में उसकी सीटें काफी कम आई। BJP को 73 तो JDU को मात्र 43 सीट ही मिली। LJP की वजह से 28 सीटों का नुकसान उठाना पड़ा। बावजूद इसके बिहार में सरकार NDA गठबंधन की ही बनी।

मगर, इसके बाद भी समय-समय पर BJP और JDU के बीच प्रेशर पॉलिटिक्स होती रही है। अंदर ही अंदर दोनों पार्टियों के नेता एक-दूसरे पर दबाव बनाने में लगे रहते हैं। JDU की स्ट्रैटजी ये थी कि LJP की वजह से जो नुकसान विधानसभा चुनाव में हुआ, उसकी भरपाई वो LJP के बागी सांसदों को अपनी पार्टी में शामिल करवा कर पूरी कर ले। जिससे लोकसभा के अंदर BJP की तुलना में उसका वर्चस्व बढ़ जाएगा। उसके 16 और LJP के बागी 5 सांसदों को मिलाकर लोकसभा में उसके कुल सांसदों की संख्या 21 हो जाएगी। इस वजह से संसद में उसका दबदबा भी बना रहेगा।

संसदीय दल का नेता बनवा BJP ने बिगाड़ दिया खेल
सूत्र बताते हैं कि JDU की प्लानिंग के बारे में भाजपा के कुछ बड़े नेताओं को पता चल गया था। इसलिए BJP के बिहार प्रभारी भूपेंद्र यादव ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला के साथ मिलकर पहले से ही अलग तरह की फिल्डिंग कर रखी थी। LJP के बागी सांसदों को गुप्त तरीके से पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद और संसदीय दल के नेता के पद पर कब्जा जमाने के लिए BJP ने अपना ज्ञान दे दिया। फिर क्या था, बागी पशुपति कुमार पारस का ध्यान इसी पर फोकस हो गया।

सबसे पहले उन्होंने सांसद महबूब अली कैसर, वीणा देवी, चंदन सिंह, प्रिन्स राज और पूर्व बाहुबली सांसद सूरजभान सिंह के साथ एक गोपनिय मीटिंग की। फिर पशुपति कुमार पारस को LJP के संसदीय दल का नेता बनाए जाने का एक लेटर लेकर सभी बागी सांसद लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला से मिलने पहुंच गए थे। हुआ वही, जो BJP चाहती थी। आननफानन में लोकसभा अध्यक्ष ने भी पशुपति कुमार पारस को LJP के संसदीय दल का नेता मान लिया। इसके बाद पशुपति कुमार पारस ने राष्ट्रीय अध्यक्ष पद पर अपना दावा ठोक दिया। फिर पटना में राष्ट्रीय कार्यकारिणी की मीटिंग भी कर ली और वो राष्ट्रीय अध्यक्ष भी अब बन गए।

इस तरह से BJP ने JDU की प्रेशर पॉलिटिक्स के खेल को पूरी तरह से बिगाड़ कर रख दिया। हालांकि, BJP और JDU के बीच पशुपति कुमार पारस और उनके समर्थन वाले सांसद एक मोहरा बनकर रह गए हैं। क्योंकि, दूसरी तरफ चिराग पासवान ने ऐलान कर दिया है कि वो बागियों से पार्टी को बचाने के लिए राजनीतिक और कानूनी लड़ाई लड़ने के लिए पूरी तरह से तैयार हैं।

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