Sunday, April 11, 2021
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बदहाली के भंवर में फंसे सिनेमाघर, कोरोना का कहर या अंदरूनी कलह?


भारतीय सिनेमाघर/मल्टीप्लेक्स शायद अब तक के अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रहे हैं. कोरोना संकट के कारण सात महीनों तक बंद रहे देशभर के सिनेमाघरों में से अधिकतर को खुले अब एक माह से ज्यादा गुजर गया है, लेकिन अब भी तमाम सिंगल स्क्रीन थिएटर, छोटे-बड़े मल्टीप्लेक्स सहित फिल्म एग्जिबिटर्स और वितरकों पर से बदहाली के बादल छंटते नजर नहीं आ रहे हैं. नई फिल्मों के रिलीज न होने की वजह से दर्शक भी सिनेमाघरों का रुख नहीं कर रहे हैं. पुरानी फिल्मों द्वारा टिकट खिड़की पर फिर से रौनक लाने की कवायद सफल होती नहीं दिख रही है. यही वजह है कि फेस्टिव सीजन में 200-300 करोड़ रुपये प्रति फिल्म उगाही करने वाला बॉक्स ऑफिस अब भी ठप्प पड़ा है.

हालांकि लंबे इंजार के बाद दीपावली के अगले दिन ‘सूरज पे मंगल भारी’ रिलीज तो हुई, लेकिन मुट्ठीभर दर्शकों के आने से सिनेमाघर स्टाफ के चेहरे फिर से मुरझाते दिख रहे हैं. एक रिपोर्ट के अनुसार साल 2019 में 10,948 करोड़ रुपये खर्च कर भारतीय सिने दर्शकों द्वारा 1.03 बिलियन सिनेमा टिकट खरीदे गये थे, जबकि एक अनुमान के अनुसार कोविड के कारण छह महीनों तक सिनेमाघरों के बंद रहने से इंडस्ट्री को करीब 1.2 बिलियन डॉलर का नुकसान उठाना पड़ा है.

इस लिहाज से मौजूदा हालात में सिनेमा कारोबार से जुड़े लोगों का सदमें में आना लाजमी है. हालांकि एक तरफ नयी फिल्मों की आवक पर ब्रेक सा लगा हुआ है और दर्शक भी फिल्म देखने नहीं आ रहे हैं तो दूसरी ओर कुछेक नये-पुराने मुद्दों को लेकर फिल्म प्रदर्शकों, वितरकों, निर्माताओं और सिनेमाघरों के बीच पनपी असहमतियां अब तकरार में बदलती भी दिख रही हैं.

इसमें दो राय नहीं कि कई अन्य क्षेत्रों की तरह सिनेमा उद्योग भी कोरोना के कहर खामियाजा भुगत रहा है और काफी हद तक पर्यटन क्षेत्र की तरह सबसे ज्यादा नुकसान इस क्षेत्र को ही उठाना पड़ रहा है. लेकिन यह भी देखने में आया है कि विभिन्न चरणों में अनलॉक की प्रक्रिया के बाद कई क्षेत्रों में, बेशक पहले की तरह न सही लेकिन कामकाज सामान्य तो हुआ है. पर्यटन, खान-पान, रेस्तरां, मॉल आदि क्षेत्रों में जिंदगी पटरी पर लौटती दिख रही है. लेकिन सिंगल स्क्रीन सिनेमाघर, मल्टीप्लेक्स चेन और इससे जुड़े लोग अब भी विकट परिस्थितियों का सामना कर रहे हैं.

तो क्या केवल कोरोना के डर के कारण ही इस क्षेत्र में स्थितियां सामान्य नहीं हो पा रही हैं? या दर्शकों के सिनेमाहाल न आने का कोई अन्य भी हो सकता है? कहीं सिनेमा जगत के लोगों के आपसी झगड़े ही तो मौजूदा परिस्थितियों पर हावी नहीं हो गये हैं?

नई फिल्मों की कमी और दर्शकों की बेरुखी
कोरोना संकट के बीच 16 अक्तूबर को सिनेमाघरों का फिर से खुलना किसी खुशखबरी से कम न था. पुरानी फिल्मों के जरिये दर्शक जुटाने की कवायद शुरू हो गयी थी. दिल्ली जैसे शहर में शुरूआत में ही 300-400 रुपये की टिकट 99 रुपये तक कर दी गयी, लेकिन दर्शकों की भीड़ फिर भी नहीं जुटी. हालांकि दर्शकों की बेरुखी इस बात को लेकर बाद तक बनी रही कि कई सप्ताह बाद भी कोई नई या बड़े सितारों वाली फिल्म रिलीज नहीं की गयी थी. लेकिन ये तो शुरूआत से ही यह साफ था कि आने वाले एक-दो महीनों तक ज्यादातर चर्चित या बड़ी फिल्में जैसे अक्षय कुमार की फिल्म लक्ष्मी, अनुराग बसु की लूडो, हंसल मेहता निर्देशित छलांग, तैश, दुर्गावती और दि बिग बुल आदि ओटीटी मंच पर ही रिलीज होंगी. बावजूद इसके कुछेक फिल्में जैसे इंदु की जवानी, ट्यूजडेज एंड फ्राइडेज, सूरज पे मंगल भारी, संदीप और पिंकी फरार, बंटी और बबली 2 और क्रिस्टोफर नोलन्स की अंग्रेजी फिल्म टेनिट की रिलीज से यह उम्मीद बन रही थी कि सिनेमाघरों पर फिर से बहार लौट सकेगी. लेकिन ऐसा नहीं हो सका। सिनेमाघरों में पुरानी फिल्में ही दिखाई जाती रहीं, जिन्हें लेकर दर्शकों में रत्तीभर भी उत्साह नहीं था.कुछ कहना चाहती हैं खाली सीटें
आखिरकार लंबे इंतजार के बाद वो दिन भी आया जब कोरोना महामारी के बीच 15 नवंबर को फिर से कोई नई हिन्दी फिल्म सिनेमाघरों की शान बढ़ा रही थी. लेकिन दर्शकों का रिस्पांस, ट्रेड की भाषा में कहें तो एकदम ठंडा था. यही वजह रही कि 50 फीसदी क्षमता के साथ, देशभर में करीब 700 स्क्रीन्स पर रिलीज की गयी ‘सूरज पे मंगल भारी’ की ओपनिंग केवल 75 लाख रुपये के साथ हुई. अगले दिन यानी भाई दूज से फिल्म का कलेक्शन गिरने लगे और पांच दिनों में यह करीब 2.20 करोड़ रुपये ही बटोर पायी. हालांकि सामान्य परिस्थितियों में ऐसी हल्की-फुल्की फिल्म औसत प्रतिक्रियाओं के बावजूद ठीकठाक कलेक्शन कर लेती है. लेकिन कोरोना के कारण न केवल भारत में, बल्कि पूरी दुनिया में फिल्मों के कलेक्शंस पर गाज गिरी है.

दरअसल, दर्शकों के बगैर आठ महीनों तक मजबूरन सोती रही सिनेमाघरों की सीटें ‘डिसिन्फेक्टैन्ट स्प्रे’ की बौछार से भड़भड़ाकर उठ तो गयी हैं, लेकिन पुरानी फिल्मों के कारण उपजी दर्शकों की गैर मौजूदगी ने इन्हें फिर से ऊंघने पर मजबूर कर दिया है. फट्टे वाली हो या रैक्सीन की, या फिर आरामदायक रेक्लाइनर ही क्यों न हो, बिना ऑडियंस के लाख रूपये की सीट का भी कोई मोल नहीं है. इसलिए इन सीटों को इंतजार है तो बस सिनेमा के उन सलोने पंछियों का जिनके लिए सिनेमाघर में बैठकर फिल्म देखना किसी दीवानगी से कम नहीं है. लेकिन कोरोनाकाल में महीनों तक घरों में बंद रहने के बाद डर के साये में बाहर निकले इन सलोने पंछियों की हालत भी अब पहले जैसी नहीं रह गयी है.

मास्क, दस्ताने, शील्ड, दो गज की दूरी, तरह-तरह की एहतियात-पाबंदियों के साथ फिल्म देखना, जंग पर जाने जैसा है. यूं भी लंबे समय तक पिजरे में रहने के बाद पंछी को फिर से उड़ान में भरने में दिक्कत तो होती है. लेकिन जब खुले आकाश में वह अन्य पंछियों को उड़ते देखता है तो उसके पंखों में खुद ब खुद जान आ जाती है. हो सकता है कि नई फिल्मों की आवक से दर्शक रूपी ये सलोने पंछी भी फिर से सिनेमाघरों की सीटों पर बैठें. लेकिन इसके लिए कुछ उत्साहवर्धक प्रयासों की भी सख्त जरूरत है, जो फिलहाल तो होते नहीं दिख रहे हैं.

जरूरत तो आन पड़ी है
जाहिर तौर पर दर्शकों को सिनेमाघरों तक वापस लाने के लिए कुछ करना होगा. चूंकि लंबे समय बाद सिनेमाघरों में पहली फिल्म मनोज बाजपेयी की रिलीज हुई थी, सो शुरूआत भी उन्होंने ही की. इस मकसद से कि लोग थियेटर की ओर कूच करेंगे, उन्होंने #चलोसिनेमा के साथ एक मल्टीप्लेक्स के बाहर प्रवेश के लिए लगी दर्शकों की कतार का वीडियो शेयर किया. सिनेमाहाल के भीतर से खुद की एक फोटो शेयर कर उनका साथ दिया दिलजीत दोसांझ और फातिमा सना शेख ने. अच्छा होता कि मिनट-मिनट में ट्वीटियाने वाले तथाकथित नए और पुराने सितारे इस हैशटैग को ट्रैंड करवाने में मददगार साबित होते, लेकिन उनकी प्राथमिकताएं शायद कुछ और ही रहती हैं.

खैर, इधर-उधर की बातें, वगैराह वगैराह… मालदीव के दिलकश समुद्री तटों हज छुट्टियां मानाने गयी तारिकाओं की हॉट फोटोज तो आ रही थीं. लेकिन #चलोसिनेमा को लेकर जोश ठंडा था. इस बीच अचानक आमिर खान अपनी बेटी ईरा के साथ मुम्बई के एक सिनेमाघर में 17 नवंबर की शाम को फिल्म देखने पहुंच गये. इस बारे में किया गया उनका एक ट्वीट बताता है कि लंबे समय बाद फिर से खुले सिनेमाहाल्स में फिल्म देखने को लेकर वह कितने उत्सुक थे. मनोज बाजपेयी ने बिना देरी किये उनका शुक्रिया भी अदा कर दिया.

उधर, दर्शक दीर्घा से भी बहुत सारे उत्साही दर्शक अपने अनुभवों को साझा करते दिखे। दर्शकों द्वारा शेयर की गयी फोटोज, वीडियो और संदेश देखकर अंदाजा लगाया जा सकता था कि वे सिनेमाहाल में फिल्म देखने को लेकर अपनी दीवानगी दर्शाने में कभी कंजूसी नहीं करते. फिल्म इंडस्ट्री भी दर्शकों को ही माईबाप मानती है. बावजूद इसके मनोज, दिलजीत, फातिमा और आमिर के प्रयासों से कोई खास फर्क नहीं पड़ता दिखा. फिल्म बिरादरी की ओर से कोई जोश जगाने वाला हैशटैग, कोई हरकत या आहट नहीं हुई, जिससे पता चलता कि इस मुश्किल वक्त में वो भी बाकी लोगों के साथ हैं.
नई मुसीबतों के साथ पुराने झगड़े

निर्माता, वितरक, प्रदर्शक और सिनेमाघर वालों के आपसी टंटे यूं तो चलते ही रहते हैं. एक आम दर्शक ऐसी बातों पर तब तक ध्यान नहीं देता जब तक कि नई फिल्मों की रसद न रुक जावे, लेकिन इस बार तो कड़वाहट इतनी बढ़ गयी है कि कोरोना भी बौना दिखाई दे रहा है. वैसे ये संकट लॉकडाउन के साथ ही शुरू हो गया था, जब कोरोना संकट की वजह से जब गुलाबो सिताबो, गुंजन सक्सेनाः दि कारगिल गर्ल, शकुंतला देवी, दिल बेचारा सरीखी फिल्में ओटीटी पर रिलीज कर दी गयीं तो मल्टीप्लेक्स संगठन ने कड़ा ऐतराज जताया था. उनका कहना था कि लॉकडाउन के चलते देशभर के सिनेमाघरों को हर महीने 80-90 करोड़ रु का नुकसान उठाना पड़ रहा है.

हालांकि कोरोना के दूरगामी परिणामों को देखते हुए स्थितियां सामान्य होने के इंतजार के मद्देनजर सिनेमाघरों से ओटीटी पर शिफ्ट होने को लेकर निर्माताओं के अपने तर्क थे, जिसका विस्तृत ब्यौरा फिर कभी। हां, ये जरूर है कि एक तरफ सिनेमाघर वाले स्थितियां सामान्य होने के साथ सिनेमाहाल्स खुलने का इंतजार कर रहे थे तो दूसरी तरफ वो फिल्म निर्माता, जिनकी फिल्मों की रिलीज कोविड के कारण टाल दी गयी थी, का सब्र का बांध टूट रहा था. लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलू ये भी है कि बड़े मल्टीप्लेक्स चेन, फिल्म वितरकों और निर्माताओं के बीच मुनाफा प्रतिशत को लेकर मची नयी खींचतान और नई फिल्म के डिजिटल प्रसारण (सैटेलाइट एवं ओटीटी आदि) अवधि को कम करने (8 हफ्ते से 2 या 4 हफ्ते करने) को लेकर शुरू हुई रार के बीच सिंगल स्क्रीन एवं छोटे मल्टीप्लेक्स वाले खुद को बेवजह पिस रहा मान रहे हैं. यहां एक अन्य मुद्दा वर्चुअल प्रिंट फीस (वीपीएफ) को लेकर भी चल रहा है, जिस पर कुछेक सहमतियां बनी तो हैं, लेकिन वे कितनी कारगर साबित होती हैं, देखना बाकी है.

मोटे तौर पर अलग-अलग विषयों को लेकर तमाम मंचों के बीच तकरार की खाई दिनों दिन बढ़ती जा रही है, जिसमें से शायद आने वाले दिनों में सिंगल स्क्रीन और छोटे मल्टीप्लेक्स वाले खुद को अलग करना चाहेंगे. हालांकि इस पूरे सिस्टम में बड़े मल्टीप्लेक्स चेन का महत्वपूर्ण रोल है और दबदबा भी, लेकिन मौजूदा सूरत यही बनी हुई है कि जब तक नई फिल्मों की आवक के साथ सिनेमाघरों, मल्टीप्लेक्सों, वितरकों, प्रदर्शकों के आपसी झगड़े नहीं सुलटेंगे, तब तक सिनेमाघरों पर फिर से बहार लौटनी मुश्किल है.





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