Wednesday, October 20, 2021
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Afghanistan Taliban Crisis: कौन हैं अफगानिस्तान सरकार की तरफ से तालिबान के खिलाफ लड़ाई के ‘हीरो’ और ‘विलेन’?


नई दिल्ली: कुछ हफ्ते पहले ही अमेरिका (Amerca) से एक वीडियो सामने आया था, जिसमें अफगानिस्तान के लिए विशेष अमेरिकी दूत जलमय खलीलजाद (Zalmay Khalilzad) को एक अमेरिकी नागरिक अपशब्द सुनाते हुए दिखाई दे रहा था. वीडियो में खलीलजाद को अमेरिका की किसी सरकारी इमारत के सामने वह व्यक्ति अपशब्दों से संबोधित कर एक ‘हारने वाला व्यक्ति’ कह रहा है और पूछ रहा है कि अफगानिस्तान का क्या हुआ? खलीलजाद उससे बचते हुए तेज कदमों से भवन में प्रवेश करने का प्रयास करते हुए भी दिखाई दे रहे हैं.

खलीलजाद ने अफगानिस्तान से किया धोखा

वीडियो वायरल होने पर उस पर दुनियाभर के पत्रकारों, सामरिक मामलों के विशेषज्ञों, और इंफ्लुएंसर्स ने टिप्पणी की और यूजर्स ने अपनी तीखी प्रतिक्रियाएं दीं. कोई अमेरीकी नागरिक की निंदा कर रहा था तो कोई उसे सही ठहरा रहा था. बहरहाल, अधिकांश प्रतिक्रियाओं में खलीलजाद पर पाकिस्तान (Pakistan) की शह पर तालिबान (Taliban) के हाथों अफगानिस्तान (Afghanistan) बेच देने का आरोप लगाया गया. वहीं, कई यूजर्स ने उन्हें आईएसआई का ‘मोहरा’ तक करार दिया. 

खलीलजाद की पाकिस्तान समर्थक नीतियों की दुनिया में आलोचना

अफगान मामलों के कई विशेषज्ञों का मानना है कि अफगानिस्तान की इस दुर्दशा और तालिबान के हाथों में सत्ता जाने का सबसे बड़ा ‘श्रेय’ जलमय खलीलजाद को ही जाता है. उनकी पाकिस्तान समर्थक नीतियों की विश्व भर की मीडिया ने आलोचना की है. प्रतिष्ठित अमेरिकी अखबार ‘पॉलिटिको’ का मानाना था- ‘9/11 के बाद से अमेरिका ने जिन चीजों के लिए लड़ाई लड़ी है, शांति दूत जलमय खलीलजाद के नेतृत्व में अमेरिकी सरकार वह सब कुछ खोने वाली है.’ 

आईएसआई के इशारे पर हो रहा काम

खलीलजाद, जो अफगान शांति प्रक्रिया के लिए अमेरिका द्वारा तैनात किए गए प्रमुख राजनयिक और नीति-निर्माता थे, ने यह सुनिश्चित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी कि अफगानिस्तान पर अमेरिका की नीति पाकिस्तान के हितों के अनुरूप हो और पाकिस्तान द्वारा ही नियंत्रित की जाए. विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि पाकिस्तान खुफिया एजेंसी आईएसआई के इशारे पर खलीलजाद ने सुनिश्चित किया कि अफगान शांति प्रक्रिया को पाकिस्तान प्रत्यक्ष रूप से नियंत्रित करे और अंतत: तालिबान के हाथों में सत्ता सौंप दी जाए. 

राष्ट्रपति बनने का था ‘सपना’

अफगानिस्तान मामलों पर नजर रखने वालों के मुताबिक ‘Zalmay Khalilzad को शायद ये भी उम्मीद रही होगी कि शांति समझौते के अंत तक वह इस स्थिति में होंगे कि अमेरिका और अन्य शक्तियों द्वारा खुद को अफगानिस्तान का राष्ट्रपति बनवा सकें हालांकि जब शांति समझौते के दौरान राष्ट्रपति अशरफ गनी और डॉ अबदुल्ला अबदुल्ला के प्रभाव को वह कम करने में असफल रहे तो राष्ट्रपति बनने का सपना दूर की कौड़ी लगने लगा.’

पाकिस्तान की कई बार यात्रा की
जलमय खलीलजाद ने पिछले एक साल के दौरान पाकिस्तान की कई बार यात्रा की. इन यात्राओं का आधिकारिक हवाला अफगान शांति प्रक्रिया पर पाकिस्तान सरकार से बातचीत का दिया गया. पर पाकिस्तान की लगभग हरेक यात्रा के दौरान खलीलजाद की पाकिस्तानी सेना प्रमुख और आईएसआई प्रमुख से मुलाकातें सुर्खियों में छायी रहीं. 

जब पाकिस्तान की किया बचाव
इसका एक उदाहरण हाल ही में अप्रैल 2021 में देखने को मिला. इस समय, जब तालिबान अफगानिस्तान में कत्ले-आम मचा रहा था, अमेरिकी सीनेट की अंतरराष्ट्रीय संबंधों की समिति में हुई सुनवाई के दौरान खलीलजाद ने पाकिस्तान का बचाव करते हुए तालिबान को पाकिस्तान द्वारा समर्थन दिए जाने की बात को नकारा. खलीलजाद ने सीनेट समिति को विश्वास दिलाया कि पाकिस्तानी नेतृत्व ने आश्वासन दिया है कि वह तालिबान का समर्थन नहीं करता और जोर देकर कहा, ‘मुझे लगता है कि अफगानिस्तान में पाकिस्तान गृह युद्ध के प्रभाव को समझता है.’
 
इस तरह पाकिस्तान का दखल बढ़ाया
इसके पहले, सितंबर 2021 में जब अफगान शांति प्रक्रिया अपने सबसे महत्त्वपूर्ण चरण में थी, तब जलमय खलीलजाद ने शांति प्रक्रिया में पहले पाकिस्तान का दखल बढ़ाया और बाद में दुनिया भर के सामने उसके प्रधानमंत्री इमरान खान और सेना प्रमुख बाजवा को ‘महत्वपूर्ण भूमिका’ निभाने के लिए धन्यवाद करने इस्लामाबाद पहुंचे और दुनियाभर को बताते रहे कि अफगान शांति प्रक्रिया पाकिस्तान के बिना संभव हो ही नहीं सकती.

विश्व की मीडिया के सामने रखा गलत पक्ष
इसके अलावा, कई ऐसे मौके सामने आए जब पाकिस्तान को शर्मिंदगी से बचाने के लिए खलीलजाद ने अपना एकतरफा समर्थन दिया और बचाव में कूद पड़े. जुलाई 2021 में जब इस्लामाबाद में अफगानी राजदूत की बेटी सिलसिला अलिखेल को अगवा कर लिए जाने के बाद जब पाकिस्तान दुनियाभर से विरोध और अफगानिस्तान सरकार के हमलों को झेल पाने में नाकाम था, तब पाकिस्तानी सेना प्रमुख जनरल कमर जावेद बाजवा के आदेश पर खलीलजाद ने तुरंत पाकिस्तान की यात्रा की और पाकिस्तानी सेना प्रमुख बाजवा, आईएसआई प्रमुख जनरल फैज हामिद और प्रधानमंत्री इमरान खान के सामने पेश हुए और विश्व भर की मीडिया के सामने पाकिस्तान का बचाव किया.

अफगानिस्तान की सेना और राजनेताओं से नहीं बनी
जब से खलीलजाद को अमेरिका द्वारा अफगानिस्तान का विशेष राजदूत नियुक्त किया गया, तब से ऐसी कई तस्वीरें सामने आईं जिनमें वे तालिबानी नेताओं के साथ गलबहियां करते दिखाई दे रहे थे या उनके ‘सम्मान’ में बयान दे रहे थे. उनकी तालिबान और पाकिस्तान समर्थक चालों का अफगानिस्तान के सैन्य और राजनैतिक नेतृत्व ने हमेशा विरोध किया है. 2019 में अपनी अमेरिका यात्रा के दौरान अफगान सुरक्षा सलाहकार हमदुल्ला मोहिब ने वाशिंगटन में पत्रकारों को संबोधित करते हुए कहा था कि खलीलजाद खुद को एक नई ‘कार्यवाहक सरकार’ के ‘वायसराय’ के रूप में स्थापित करना चाहते हैं. अफगान शांति वार्ता के पूरे काल में खलीलजाद को पाकिस्तान समर्थक रवैये की वजह से अफगानिस्तान की सेना और राजनेताओं से नोंक-झोंक होती रही।

अमरुल्लाह सालेह ने ली लगातार टक्कर
खलीलजाद के विपरीत, अफगानिस्तान में एक ऐसा नेता भी था जो लगातार तालिबान से लोहा लेता रहा और उसे समर्थन देने के लिए पाकिस्तान पर हमलावर रहा. अफगानिस्तान के उप-राष्ट्रपति अमरुल्लाह सालेह, जो पहले अफगान खुफिया एजेंसी ‘एनडीएस’ के प्रमुख भी रहे थे, तालिबान का खुल कर मुकाबला करते रहे. अफगान शांति प्रक्रिया के बीच जब तालिबान के हमलों ने जोर पकड़ा, तब उन्होंने खुद मोर्चा संभाला और अफगान नागरिकों की रक्षा के लिए मैदान में कूद पड़े. इस दौरान, वह सैन्य नेतृत्व से मिलकर आतंक-रोधी योजनाओं को अंजाम देते रहे और साथ-साथ काबुल में विदेशी राजनयिकों से मिलकर शांति प्रक्रिया में तालिबान और पाकिस्तान के प्रभाव को कम करने का प्रयास करते रहे.

पाकिस्तान की खोली थी पोल
जुलाई-अगस्त 2021 में उन्होंने तालिबान के खिलाफ जनता को एकजुट करने के लिए रैलियां भी निकालीं, जो ‘अल्लाह-हो-अकबर’ के नारों से गूंज उठती थीं. इस दौरान, अफगानिस्तान की दुर्गति में पाकिस्तान की संलिप्तता जग-जाहिर करने के लिए उन्होंने #SanctionPakistan हैशटैग को गति प्रदान की, जो अब भी सोशल मीडिया पर लगभग हर रोज ट्रेंड करता है. 

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सालेह पर तालिबान ने किया था जानलेवा हमला
खलीलजाद और सालेह के प्रति तालिबान के रवैये में बड़ा अंतर सितंबर 2020 में तब देखने को मिला जब तालिबान खलीलजाद की कतर की राजधानी दोहा में आवभगत कर रहा था, वहीं अमरुल्लाह सालेह के ऊपर एक जानलेवा हमले की योजना पर काम रहा था. 9 सितंबर 2020 को सालेह के काफिले पर हुए तालिबानी हमले में सुरक्षा दल के 10 सदस्य मारे गए और 31 घायल हुए. इस दौरान वे बाल-बाल बचे और उन्हें केवल मामूली चोटें आईं. 

दुनिया को दर्द बयां करते रहे सालेह
तालिबान और पाकिस्तान को समर्थन दे रहे अफगानों को लेकर सालेह अपनी व्यथा दुनिया भर के सामने रखते आए हैं. हाल ही में 21 जुलाई 2021 को सालेह ने भारत-पाकिस्तान के 1971 के युद्ध की तस्वीर शेयर की थी, जिसमें पाकिस्तानी सेना को भारतीय सेना के सामने आत्मसमर्पण करना पड़ा था. यह तस्वीर ट्वीट करते हुए सालेह ने लिखा, ‘हमारे इतिहास में ऐसी कोई तस्वीर नहीं है और न आगे होगी. हां, कल जब रॉकेट हमारे ऊपर से गुजरा और कुछ ही दूर गिरा तो मैं कुछ क्षण के लिए घबरा गया था. प्रिय पाकिस्तानी ट्विटर हमलावर, इस तस्वीर में आपको मिले सदमे को तालिबान और आतंकवाद ठीक नहीं करेंगे. दूसरे रास्ते तलाश कीजिए.’ 

भारत में भी हैं सालेह के प्रशंसक
इस ट्वीट ने पाकिस्तानी राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार मोईद यूसुफ समेत अन्य पाकिस्तानी नेताओं को आग-बबूला कर दिया था और पूरा पाकिस्तानी नेतृत्व उन पर एक साथ हमलावर हो गया था. वहीं, सालेह के इस बयान की भारत में भरपूर सराहना हुई थी. यहां यह उल्लेख करना महत्वपूर्ण है कि ट्विटर पर अमरुल्लाह सालेह का खासा प्रभाव है और उनके 7 लाख 42 हजार से अधिक फॉलोअर्स में भारतीयों की भारी संख्या है. 

अंतिम दम तक लड़े सालेह
अंतिम दम तक लड़ने वाले लड़ाके की तरह सालेह ने अब भी तालिबान की हुकूमत स्वीकार नहीं की है. बीते रविवार को काबुल पर तालिबान द्वारा कब्जा कर लिए जाने के बाद सालेह ने उसी दिन शाम को ट्वीट कर अफगान जनता को कहा, ‘मैं तालिब आतंकवादियों के आगे कभी नहीं और किसी भी परिस्थिति में नहीं झुकूंगा. मैं अपने नायक, कमांडर, लीजेंड, और गाइड, अहमद शाह मसूद की आत्मा और विरासत के साथ कभी विश्वासघात नहीं करूंगा. मैं उन लाखों लोगों को निराश नहीं करूंगा जिन्होंने मेरी बात सुनी. मैं तालिबान के साथ कभी भी एक छत के नीचे नहीं रहूंगा. कभी नहीं.’ 

सालेह की आगे की राह क्या होगी?
अफगान मामलों के जानकारों का मानना है कि सालेह, जिन्हें तालिबान अपना सबसे बड़ा दुश्मन मानता है, तालिबान से लंबी लड़ाई लड़ने का माद्दा और ताकत रखते हैं. इसके अलावा, अफगान शांति प्रक्रिया के दौरान अपने दम-खम और तीखे तेवर की वजह से सालेह अफगान जनता के मन-मस्तिष्क में एक नायक के रूप में उभरे हैं. लगातार बिगड़ती परिस्थितियों के बीच यह देखना दिलचस्प होगा कि पाकिस्तान-तालिबान गठजोड़ के खिलाफ सालेह अपनी लड़ाई को किस प्रकार आगे ले कर जाते हैं.

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