Friday, September 17, 2021
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EXPLAINED: दो बच्चों की नीति में यूपी और असम क्यों दिखा रहे इतनी दिलचस्पी? यहां जानें सबकुछ


नई दिल्‍ली. भारत में लंबे अर्से से सरकारों के लिए जनसंख्या नियंत्रण (Population Control) बड़ा मुद्दा रहा है. एक ओर जहां चीन ने जनसंख्‍या नियंत्रण (Population) के लिए दंडात्‍मक कार्रवाई का प्रावधान किया था, वहीं भारत में विभिन्न सरकारों ने हमेशा परिवार नियोजन के लाभ बताने पर ही जोर दिया. इस उपाय की सफलता पर बहस की जा सकती है, लेकिन इसकी एक सच्‍चाई यह भी है कि 1950 में देश में जो प्रजनन दर 5.9 थी, वो अब गिरकर 2.2 हो गई है. अब असम और उत्‍तर प्रदेश की सरकारों का मानना है कि बढ़ती आबादी को रोकने के लिए उन्हें दो बच्चों की नीति की जरूरत है.

किन राज्‍यों में अधिक है प्रजनन दर?

प्रजनन दर उन बच्चों की औसत संख्या को बताती है, जिन्हें प्रत्येक महिला अपने प्रजनन वर्षों के दौरान जन्म देती है. माना जाता है कि किसी देश की जनसंख्या स्थिर रहने के लिए कुल प्रजनन दर 2.1 होनी चाहिए. इसका मतलब यह है कि प्रति महिला 2.1 जन्म पर एक देश की जनसंख्या एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक स्थिर रहेगी.

1950 के दशक में भारत में प्रजनन दर 5.9 थी और 2000 के दशक की शुरुआत में भी यह 3 से ऊपर बनी रही. हालांकि, 2010 के दशक में राष्ट्रीय प्रजनन दर में गिरावट देखी गई और यह 2018 में यह 2.2 पर आ गई. बड़े भारतीय राज्यों में 3.3 प्रजनन दर के साथ बिहार पहले स्‍थान पर है. वहीं उत्‍तर प्रदेश 2.9 प्रजनन दर के साथ दूसरे स्‍थान पर है. असम की प्रजनन दर 2.2 है, लेकिन वहां के मुख्‍यमंत्री हिमंत बिस्‍व सरमा के अनुसार राज्‍य के कुछ हिस्‍सों में जनसंख्‍या विस्‍फोट है. यह राज्‍य के विकास में बाधा हो सकता है.

असम और यूपी ने क्‍या घोषणा की है?

असम में बीजेपी सरकार के लिए जनसंख्‍या नियंत्रण बड़ा मुद्दा रहा है. 2017 में विधानसभा में एक प्रस्‍ताव भी पारित किया गया था. इसका नाम ‘पॉपुलेशन एंड वीमेन इमपावरमेंट पॉलिसी ऑफ असम’ है. इसके तहत प्रावधान किया गया कि जो लोग दो बच्‍चों से अधिक बच्‍चे पैदा करेंगे, उन्‍हें सरकारी नौकरी और अन्‍य लाभ से वंचित किया जाएगा. 2019 में राज्‍य सरकार ने घोषणा कर दी कि 2021 से उन लोगों को सरकारी नौकरी के लिए आवेदन करने से रोका जाएगा, जिनके दो से अधिक बच्‍चे हैं.

असम के मुख्‍यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा ने पिछले हफ्ते कहा था, ‘हम सरकारी योजनाओं के लिए जनसंख्या मानदंडों को धीरे-धीरे लागू करेंगे. कुछ ऐसी योजनाएं हैं, जिनके लिए हम दो बच्चों के मानदंड को लागू नहीं कर सकते हैं, जैसे स्कूलों और कॉलेजों में मुफ्त एडमिशन या प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत घरों के लिए. क्‍योंकि यह सभी के लिए हैं.’

रिपोर्टों में कहा गया है कि राज्य सरकार 2017 के प्रस्ताव को लागू करने के लिए कानून ला सकती है और कुछ सरकारी योजनाओं के लिए केवल दो बच्चों या उससे कम बच्‍चे वाले लोगों को सरकारी योजनाओं में लाभार्थी बना सकती है. असम में पहले से ही दो से अधिक बच्चों वाले लोगों को स्थानीय निकाय चुनाव लड़ने से रोकने के नियम हैं.

यूपी के लिए भी बीजेपी सरकार पॉपुलेशन (कंट्रोल, स्‍टैबिलाइजेशन एंड वेलफेयर) बिल, 2021 का मसौदा लेकर आई है, जिसमें दो से अधिक बच्चों वाले लोगों को स्थानीय निकाय चुनाव लड़ने और सरकारी नौकरियों में पदोन्नति के लिए आवेदन करने या प्राप्त करने से अयोग्य घोषित करने का प्रस्ताव है. इनमें किसी भी प्रकार की सरकारी सब्सिडी भी शामिल है.

यूपी सरकार का यह मसौदा 19 जुलाई तक जनता के विचार जानने के लिए रखा गया है. यह परिवार नियोजन के मानदंडों का पालन करने वाले सरकारी कर्मचारियों को उनकी सेवा अवधि, मातृत्व या पितृत्व के दौरान दो अतिरिक्त वेतन वृद्धि का प्रस्ताव देकर परिवार नियोजन को अपनाने के लिए लोगों को प्रोत्साहित करना चाहता है. इसमें राष्ट्रीय पेंशन योजना के तहत 12 महीने की छुट्टी और पेंशन स्‍कीम में नियोक्ता के अंशदान में तीन फीसदी की बढ़ोतरी का प्रावधान भी है.

और किन राज्‍यों में है दो बच्‍चों की नीति?

देश के कई राज्‍यों में दो बच्‍चों की नीति को बढ़ावा देने के लिए नियम हैं. जैसे राजस्‍थान में जिन लोगों के दो बच्‍चों से अधिक हैं, वे सरकारी नौकरी नहीं पा सकते. साथ ही ऐसे लोग पंचायत चुनाव भी नहीं लड़ सकते.

मध्‍य प्रदेश में भी 2001 के बाद तीसरा बच्‍चा पैदा करने वाले लोग सरकारी नौकरी नहीं ले सकते. लेकिन 2005 में पंचायत चुनाव लड़ने के संबंध में ये नियम हटा दिया गया है. आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में पंचायत चुनाव लड़ने के लिए भी यही नियम है. गुजरात, उत्‍तराखंड और ओडिशा में भी दो बच्‍चों से अधिक बच्‍चे वाले लोग पंचायत चुनाव नहीं लड़ सकते हैं. महाराष्‍ट्र में भी दो बच्‍चों से अधिक बच्‍चे वाले लोग सरकारी नौकरी नहीं कर सकते.



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