Tuesday, August 3, 2021
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Nepal Crisis: सुप्रीम कोर्ट की नई संविधान पीठ का गठन, संसद भंग मामलों की करेगी सुनवाई


काठमांडू: नेपाल (Nepal) में प्रतिनिधि सभा को 22 मई को भंग किए जाने के खिलाफ दायर याचिकाओं पर सुनवाई के लिए रविवार को देश की सुप्रीम कोर्ट (Supeme Court of Nepal) की एक संविधान पीठ का गठन किया गया. पीठ की संरचना को लेकर जजों के बीच मतभेद की वजह से अहम सुनवाई में देरी हुई.

नई पीठ में शामिल हैं ये जज

पीठ का गठन नेपाल के प्रधान जस्टिस चोलेंद्र शमशेर राणा ने सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों के वरिष्ठता क्रम और विशेषज्ञता के आधार पर किया है. प्रधान जजो ने कहा था कि सदन को भंग किए जाने से जुड़े मामलों पर सुनवाई शुरू करने के लिए 6 जून को संविधान पीठ का गठन किया जाएगा. कोर्ट के अधिकारियों के मुताबिक, नई संविधान पीठ में जस्टिस दीपक कुमार कार्की, जस्टिस आनंद मोहन भट्टाराई, जस्टिस मीरा ढुंगना, जस्टिस ईश्वर प्रसाद खातीवाड़ा और स्वयं प्रधान जज शामिल हैं.

PM की सलाह पर राष्ट्रपति ने किया था ये काम

नेपाल की राष्ट्रपति विद्या देवी भंडारी (Bidya Devi Bhandari) ने अल्पमत सरकार की अगुवाई कर रहे प्रधानमंत्री के.पी. शर्मा ओली (K.P Sharma Oli) की सलाह पर 275 सदस्यीय प्रतिनिधि सभा को 5 महीनों में दूसरी बार 22 मई को भंग कर दिया था और 12 तथा 19 नवंबर को मध्यावधि चुनाव कराने की घोषणा की थी. जस्टिस विशंभर प्रसाद श्रेष्ठ के बीमार पड़ने के बाद उनके क्रमानुयायी जस्टिस भट्टाराई और जस्टिस खातीवाड़ा को संविधान पीठ में शामिल किया गया है. इससे पूर्व संविधान पीठ के गठन को लेकर विवाद के कारण सुनवाई प्रभावित हुई थी.

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SC में सदन भंग के खिलाफ दर्ज हैं 30 याचिकाएं

अदालत के सूत्रों ने कहा कि प्रधान जज राणा ने इससे पहले जस्टिस दीपक कुमार कार्की, जस्टिस आनंद मोहन भट्टाराई, जस्टिस तेज बहादुर केसी और जस्टिस बाम कुमार श्रेष्ठ को उस पीठ के लिए चुना था जो असंवैधानिक तौर पर सदन को भंग किए जाने के खिलाफ दायर करीब 30 याचिकाओं पर सुनवाई करती. भंग किए गए सदन के करीब 146 सदस्यों ने भी सदन की बहाली के अनुरोध के साथ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है. इनमें नेपाल कांग्रेस के अध्यक्ष शेर बहादुर देउबा भी शामिल हैं, जिन्होंने संविधान के अनुच्छेद 76 (5) के तहत नई सरकार के गठन का दावा भी पेश किया था.

जजों को पीठ में शामिल करने को लेकर हुआ विवाद

राष्ट्रपति भंडारी ने प्रधानमंत्री ओली और विपक्षी गठबंधन दोनों के सरकार बनाने के दावे को खारिज करते हुए कहा था कि दावे अपर्याप्त हैं. विवाद उस वक्त खड़ा हो गया था जब देउबा के वकील ने उन दो जजों को संविधान पीठ में शामिल करने पर सवाल खड़े किए थे, जो कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल के एकीकरण एवं पंजीकरण के पुनर्विचार मामले में पूर्व में फैसला दे चुके हैं. जस्टिस तेज बहादुर केसी और जस्टिस बाम कुमार श्रेष्ठ के पीठ न छोड़ने का फैसला लेने के बाद, दो अन्य न्यायाधीशों ने पीठ से खुद को अलग कर लिया. इससे प्रधान जस्टिस राणा को पीठ का पुनर्गठन करने पर मजबूर होना पड़ा.

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PM केपी ओली के वकील ने जताया असंतोष

इस बीच, प्रधानमंत्री ओली के वकीलों ने रविवार को प्रधान जज राणा द्वारा सदन को भंग किए जाने के मामले की सुनवाई के लिए संविधान पीठ के पुनर्गठन किए जाने पर असंतोष व्यक्त किया है. अधिवक्ता राजाराम घीमरी, दीपक मिश्रा, कृष्ण प्रसाद भंडारी और यज्ञमणि न्यूपाणे ने अदालत के समक्ष दावा किया कि मौजूदा रोस्टर (नामावली) के 13 न्यायाधीशों में से 11 मामले की सुनवाई के लिये उपयुक्त नहीं है.

जब प्रधान न्यायधीश ने वकीलों को दी चेतावनी

सुनवाई ओली के अधिवक्ताओं के आवेदन दायर करने के बाद बाधित हुई जिसमें तर्क दिया गया है कि न्यायाधीश मामले की सुनवाई नहीं कर सकते क्योंकि कुछ याचिकाकर्ता संसदीय सुनवाई समिति से जुड़े थे, जिसने शीर्ष अदालत में उनकी नियुक्ति को लेकर सुनवाई की थी. ये वही अधिवक्ता हैं जिन्होंने सदन को फिर से बहाल करने और ओली को फिर से पद पर स्थापित करने के लिये रिट याचिका दायर की थी. इसके जवाब में प्रधान जज ने अधिवक्ताओं को चेतावनी दी कि अगर उन्होंने अपना आवेदन वापस नहीं लिया तो उन पर अदालत की अवमानना का आरोप लगाया जा सकता है.

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ओली के वकीलों ने हालांकि कहा कि वे अपना आवेदन वापस नहीं लेंगे और आरोपों का सामना करेंगे. इस बीच अटॉर्नी जनरल रमेश बादल ने भी पीठ के पुनर्गठन का विरोध करते हुए कहा कि मामले की सुनवाई के लिए गठित मूल पीठ को ही उस पर आगे बढ़ना चाहिए. नेपाल के अखबार ने इस पर टिप्पणी की कि मामले की जांच के लिए गठित संविधान पीठ की संरचना को लेकर एक के बाद एक आ रही बाधाओं से प्रतिनिधि सभा को भंग करने के संबंध में सुनवाई का भविष्य अधर में लटका नजर आ रहा है.

ओली के इस कदम ने उड़ाया संविधान का मजाक

इस बीच, विपक्ष के गठबंधन ने ओली सरकार द्वारा कैबिनेट में फेरबदल किए जाने की शनिवार को निंदा की. ओली ने शुक्रवार को मंत्रिमंडल में फेरबदल किया था. नए कैबिनेट में तीन उप प्रधानमंत्री, 12 कैबिनेट मंत्री और दो राज्य मंत्री हैं. विपक्षी गठबंधन ने एक बयान में कहा कि ऐसे समय में जब सदन को भंग किए जाने का मामला सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है तब मंत्रिमंडल में फेरबदल कर ओली ने संविधान और लोकतांत्रिक मूल्यों का उपहास किया है.

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