Rangbaaz: Darr Ki Rajneeti Review: बाहुबली नेता ने कैसे खड़ा किया डर का साम्राज्य? भरपूर है इस सीरीज में रोमांच

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स्टार कास्ट: विनीत सिंह, आकांक्षा सिंह, विजय मौर्या, राजेश तैलंग, प्रशांत नारायण, गीताजंलि कुलकर्णी आदि

निर्देशक: सचिन पाठक

स्टार रेटिंग: 3.5

कहां देख सकते हैं: जी5 पर

Rangbaaz: Darr Ki Rajneeti Review: रंगबाज सीरीज बढ़ती चली जा रही है. ‘रंगबाज: डर की राजनीति’ इस सीरीज का तीसरा सीजन है. केवल 6 एपिसोड्स में बिहार के बाहुबली की कहानी को बड़े करीने से समेटा गया है. सबसे खास बात ये कि बाहुबली की रोमांटिक और लोगों के मददगार वाली छवि को भी उभारा गया है. इतना ही नहीं पूरी सीरीज में ईमानदार नेता की तरह दिखने वाले नेता कैसे अपनी सरकार बचाने के लिए बाहुबली नेता के सामने झुक जाते हैं, ये भी दिखाया गया है.

यूं कहानी को सच्चे घटनाक्रमों से प्रभावित बताया गया है, लेकिन राजनीति के दिग्गज एक पल में बता सकते हैं कि कौन व्यक्ति कौन सा किरदार निभा रहा है. बड़े नेताओं में इस सीरीज में लखन राय (विजय मौर्य) के और (मुकुल कुमार) के तौर पर दिखेंगे. वहीं बाहुबली नेता की जगह शाह हारुन अली बेग (विनीत सिंह) को दिखाया गया है, उनकी पत्नी हिना का नाम इस सीरीज में सना (आकांक्षा सिंह) है.

निर्देशक सचिन पाठक के सामने ना केवल हिम्मत के साथ सच दिखाने की चुनौती थी, वहीं ये भी तय करना था कि राष्ट्रीय राजनीति के पचड़े को उतना ही छुआ जाए, जितना जरूरी है. इसलिए उस दौर के राष्ट्रीय राजनीति के किसी भी किरदार को नहीं दिखाया गया, हां दिल्ली में संसद के पास बाहुबली नेता की गिरफ्तारी जरूर दिखाई गई. सारे किरदारों के नाम बदलने, सीवान का नाम घिमान करने के बावजूद उसने खुलकर चारा घोटाला, रेलमंत्री की पोस्ट, पत्नी को मुख्यमंत्री बनाने की घटना आदि खुलकर दिखाया गया है.

6 एपिसोड्स की इस कहानी में हारुन के बचपन की कहानी भी दिखाई गई है कि कैसे उसका एक भाई पढ़-लिखकर दुबई मे जॉब कर रहा है, दीपेश जैसा दोस्त भी है, जिसकी मां उसको दंगाइयों से बचाती है. वहीं हारुन का एक झगड़ा उसे स्थानीय जनता दल नेता दशरथ सिंह के साथ काम करने को मजबूर कर देता है, धीरे-धीरे  वो उसका दायां हाथ बन जाता है.

फिर उसे धोखा देकर लखन राय से सीधे टिकट मांगने पहुंचता है और एक दिन विधायक भी बन जाता है. लेकिन उसका दोस्त दीपेश लेफ्ट पार्टी की टिकट पर जेएनयू का प्रेसीडेंट बन जाता है, जबकि धिमान में हारुन लैफ्ट के लोगों और नक्सलियों का ही सबसे बड़ा दुश्मन था. जब एक लेफ्ट नेता का मर्डर हारुन के हाथों हो जाता है तो दीपेश उसी के खिलाफ चुनाव लड़ने धिमान आ जाता है. हारुन उसे समझाता है, लेकिन नही मानता तो उसका मर्डर कर देता है.

इधर हारुन लखन राय के लिए विधायकों का किडनैप करके उसे सीएम बनवा देता है. लेकिन जैसे ही लोकसभा चुनावों में उसके पीएम बनने की चर्चा चलती है, मुकुल चारा घोटाला खुलवा देता है और लखन राय गिरफ्तार हो जाता, लेकिन पहले पत्नी को बिहार राज्य की सीएम बनाता है. इधर शहर के बींचोबीच जेपी चौक पर हयात हॉस्पिटल बनाने के लिए व्यापारियों को धमकाकर उनकी जमीन ले लेता है, एक नहीं देता तो उसके 2 लड़कों को तेजाब से मरवा देता है.

तब एक एसपी उसको गिरफ्तार करने पहुंचता है, एसपी को थप्पड़ मार देता है हारुन. तब अपमानित पुलिस उस पर रेड करती है, वो एके 47 से हमला करता है और उसे नेपाल भागना पड़ता है. लेकिन मुकुल पर दवाब डालकर लखन राय उसे फिर से वापस बुलाता है, चार्ज शीट में थोड़ी हेरा फेरी के साथ. दीपेश की मां और वो दुकानदार उस केस को सालों लड़ते हैं, कभी मुकुल और एसपी भी उनकी मदद करते हुए कई बार बड़े काम करते हैं. लेकिन सब तरफ से निराश वो दुकानदार छोटे एक दिन जेल से हारुन की रिहाई के दिन उसकी हत्या कर देता है.

ये सीरीज देखने लायक हैं, कोई इसे देखकर लोग जान सकते हैं कि कैसे बाहुबली नेता ने डर का साम्राज्य खड़ा किया, कैसे उसे राजनीतिक मदद मिली और कैसे उसकी वजह से दिग्गज नेता उससे काम लेने के लिए, अल्पसंख्यक वोट लेने के लिए उसकी सारी शर्तें मानने को मजबूर होते थे और कैसे हत्या जैसी जघन्य वारदातों के बावजूद उसका बचाव करते रहे.

शायद ये सच्ची कहानी ही होगी.लेफ्ट के नेताओं के लिए भी ये मूवी देखना बनता है क्योंकि सामाजिक न्याय और साम्प्रदायिकता विरोध के नाम पर वो भी नेताओं का साथ देते रहे हैं, जबकि मूवी में देखा जा सकता है कि कैसे हारुण ने एक के बाद एक कई लेफ्ट नेताओं का मर्डर कर दिया.

विनीत सिंह का अभिनय काफी सजह लगता है. आंकांक्षा सिंह, प्रशांत नारायण, विजय मौर्या, राजेश तैलंग और गीतांजलि कुलकर्णी जैसे मंझे हुए कलाकारों  ने सीरीज को वाकई में देखने लायक बना दिया है. गाली गलौज भी नाम मात्र की ही है. हालांकि बाहुबली नेता की रोमांटिक साइड और महिलाओं के लिए कॉलेज, हॉस्पिटल, लड़की छेड़ने पर विरोध करना जैसी कई बातें आपको उसका महिमामंडन लग सकती है, खास तौर पर उसका फेवरेट शेर कब्र पर खुदवाना- ‘’मंच मेरी मजबूरी है, शौक तो शमशीरों का है’’.

ऐसे में ये सीरीज ना केवल मनोरंजन के लिए देखने वालों के लिए बल्कि बिहार की राजनीति में दिलचस्पी रखने वालों के लिए इस हफ्ते की च्वॉइस हो सकती है. साथ ही उन लोगों के लिए भी जो देश की राजनीति को इन बाहुबलियों, एके 47 रखने वाले नेताओं आदि से दूर रखना चाहते हैं.





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